जेम्स टॉड [2] ने हमें सूरतगढ़ के संस्थापक सूरत सिंह का इतिहास प्रदान किया है। राजा राज की मृत्यु के बाद, बीका के गाडी को अपने राजकुमार के एक हत्यारे के पास अपमानित किया गया था। एस 1857 (एडी 1801) में, उस्पर, सुरतन सिंग और अजीब सिंग के बड़े भाइयों, जिन्होंने जयपुर में शरण पाई थी, भटनार की मरम्मत की और जुलूस को खत्म करने के लिए असुरक्षित रईसों और भट्टियों के वासलों को इकट्ठा किया।गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018
कैसे पड़ा बिगोर का नाम फतेहगढ़
जेम्स टॉड [2] ने हमें सूरतगढ़ के संस्थापक सूरत सिंह का इतिहास प्रदान किया है। राजा राज की मृत्यु के बाद, बीका के गाडी को अपने राजकुमार के एक हत्यारे के पास अपमानित किया गया था। एस 1857 (एडी 1801) में, उस्पर, सुरतन सिंग और अजीब सिंग के बड़े भाइयों, जिन्होंने जयपुर में शरण पाई थी, भटनार की मरम्मत की और जुलूस को खत्म करने के लिए असुरक्षित रईसों और भट्टियों के वासलों को इकट्ठा किया।सूरत सिंह ने भट्टियों से छुड़वाया फतेहगढ़
फतेहगढ़ को भट्टियों के हाथों से छुड़वाने के लिए बीकानेर राज्य की फौज सूरतगढ़ आई। ओर यहां से रावत बहादुर सिंह (रावतसर), रावत पद्मसिंह (जैतपुर), चैन सिंह (वाणासर), सिक्ख टीका सिंह, साणी आसकर्ण आदि ने रात्रि के समय चढ़ाई कर सीढ़ी के सहारे गढ़ में प्रवेश किया। ओर मजबूर होकर गढ़ के भीतर के भट्टियों ने बीकानेर की अधीनता स्वीकार कर ली। इससे फतहगढ़ पर फिर से बीकानेर नरेश महाराजा सूरत सिंह का अधिकार हो गया
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